Tuesday, 23 June 2026

व्यापम से नीट 2026: विश्वसनीयता ध्वस्त, संघीय ढ़ांचे पर हमला, युवा शिकंजे में


(यह लेख प्रतिरोध का स्वर के जून 2026 अंक में प्रकाशित हुआ था, -  लेखक मृगांक)

भारत की शिक्षा व्यवस्था एक गहरे, व्यव्स्थागत संकट में फँसी हुई है, जो करोड़ों युवाओं के भविष्य को खतरे में डाल रहा है। पिछले दो दशकों में देश ने परीक्षा घोटालों की एक निरंतर श्रंखला देखी है, जिसने योग्यता-आधारित अवसरों के द्वार को छल-कपट, बड़े पैमाने पर पेपर लीक और प्रशासनिक विफलताओं के परिदृश्य में बदल दिया है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एन॰टी॰ए॰) के पतन और नीट 2026 की अनर्थकारी परीक्षा को समझने के लिए भ्रष्टाचार की उस निरंतरता को समझना आवश्यक है, जो कुख्यात व्यापम घोटाले से लेकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एन॰ई॰पी॰) 2020 की केंद्रीकरणकारी नीतियों से पोषित विशाल कोचिंग माफिया तक फैली हुई है।

व्यापम घोटाला और दण्डमुक्ति की संस्कृति

व्यापम घोटाले ने उस प्रकार की व्यापक परीक्षा धोखाधड़ी की नींव रखी, जो आज भी भारत को परेशान कर रही है। मध्य प्रदेश के प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड (एम॰पी॰पी॰ई॰बी॰) के माध्यम से संचालित इस घोटाले में संभवतः दशकों तक मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं और सरकारी भर्ती परीक्षाओं में व्यवस्थित धांधली की गई। जब 2013 से 2015 के बीच यह घोटाला एक राष्ट्रीय विवाद के रूप में सामने आया, तो इसने एक अत्यंत संगठित आपराधिक तंत्र का पर्दाफाश किया, जिसमें पेशेवर प्रतिरूपणकर्ता (इम्पर्सोनेटर), ‘सॉल्वर गैंग’ और राजनीतिक व नौकरशाही तंत्र में बैठे सहयोगी शामिल थे। परीक्षा अधिकारियों पंकज त्रिवेदी और नितिन मोहिंद्रा सहित पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे नेताओं को गिरफ्तार किया गया। फिर भी सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। गवाह संदिग्ध परिस्थितियों में मारे गए और जब मामला ठण्डा पड़ा, तो सबसे ऊपर बैठे लोग पूरी तरह अछूते बच निकले।

व्यापम ने न केवल राष्ट्रीय परीक्षाओं पर लगातार मण्डराने वाली संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया, बल्कि जवाबदेही के कुल अभाव को भी रेखांकित किया। 2002 से 2025 के बीच हुए 45 बड़े पेपर लीक मामलों की समीक्षा, जिनमें से प्रत्येक ने एक लाख से अधिक अभ्यर्थियों को प्रभावित किया, से पता चलता है कि केवल दो मामलों में ही दोषसिद्धि हुई है, और दोनों रेलवे भर्ती बोर्ड परीक्षाओं (2002 और 2010) से जुड़े थे। बाकी सभी मामले वर्षों से कानूनी अनिश्चितता में पड़े हुए हैं। दण्डमुक्ति की इस संस्कृति का स्पष्ट उदाहरण 2006 रेलवे ग्रुप-डी पेपर लीक मामले के दो आरोपी बेदी राम और विपिन दुबे हैं, जो आज उत्तर प्रदेश में एसबीएसपी के विधायक हैं, जो एनडीए की सहयोगी पार्टी है।

पूरे भारत में पेपर लीक का विस्तार

यह व्यव्स्थागत सड़ांध केवल व्यापम और नीट तक सीमित नहीं है। 2015 के बाद से राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय महत्वपूर्ण परीक्षाओं में कम-से-कम 50 पेपर लीक की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। समय के साथ ‘लीक माफिया’ ने अपनी तकनीकों को लगातार बेहतर किया है। 2000 के दशक की शुरुआत में, 2002 के रेलवे भर्ती बोर्ड लीक की तरह, फैक्स मशीनों का उपयोग होता था। 2010 के दशक में यह स्कैन किए गए प्रश्नपत्रों के डिजिटल प्रसारण और ब्लूटूथ उपकरणों तक पहुँचा। हाल के वर्षों में उम्मीदवारों की कंप्यूटर स्क्रीन पर वास्तविक समय में नियंत्रण स्थापित करने के लिए ज्मंउटपमूमत जैसे रिमोट-एक्सेस सॉफ्टवेयर का उपयोग होने लगा।

करोड़ों छात्रों को प्रभावित करने वाली अन्य बड़ी विफलताओं में शामिल हैं

·          कैट 2003ः पहली बार आई॰आई॰एम॰ में प्रवेश के लिए आयोजित परीक्षा को एक बड़े लीक के कारण दोबारा आयोजित करना पड़ा, जिसे रंजीत डॉन नामक व्यक्ति ने अंजाम दिया।

·         यू॰पी॰पी॰एस॰सी॰ 2015 और आर॰ओ॰ध्ए॰आर॰ओ॰ 2016: उत्तर प्रदेश में परीक्षा केंद्रों पर अधिकारियों ने समय से पहले प्रश्नपत्र खोलकर उनकी तस्वीरें खींच लीं, जिससे विवाद पैदा हुआ।

·         राज्य बोर्ड एवं पुलिस भर्ती लीकः 2016 कर्नाटक पीयूसी रसायन विज्ञान पेपर लीक और 2017 हिमाचल प्रदेश बोर्ड लीक जैसी घटनाओं ने स्थानीय मुद्रण और वितरण प्रणालियों की गहरी कमजोरियों को उजागर किया। हाल के वर्षों में गिरोहों ने लॉजिस्टिक्स कंपनियों से सीलबंद ट्रंक तक पकड़ लिए (जैसा कि 2024 यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती लीक में देखा गया) और निजी गोदामों में प्रश्नपत्र पहुँचाने के लिए शेल-एंटिटी प्रिंटिंग प्रेस का उपयोग किया।

एन॰टी॰ए॰ का दौरः केंद्रीकरण और 2024 के घोटाले

इन बुनियादी समस्याओं को हल करने के बजाय सरकार ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एन॰टी॰ए॰) के तहत परीक्षाओं का केंद्रीकरण कर दिया, जिसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एन॰ई॰पी॰) 2020 ने जोर-शोर से बढ़ावा दिया। विश्व बैंक-गैट्स मॉडल के अनुरूप व्यावसायीकरण और आर॰एस॰एस॰ की मजबूत केंद्रीय नियंत्रण की आपस में से मेल खाता यह कदम शीघ्र ही एकदम विनाशकारी साबित हुआ।

2024 में ही एन॰टी॰ए॰ की विश्वसनीयता कई घोटालों से ध्वस्त हो गई। नीट-यूजी 2024 परीक्षा पटना और गुजरात में पेपर लीक की खबरों से घिर गई। संदेह तब और बढ़ा जब अभूतपूर्व रूप से 67 छात्र अव्वल रहे, जिनमें से छः हरियाणा के एक ही केंद्र- हरदयाल पब्लिक स्कूल- से थे, जिसके साथ सत्ताधारी दल से राजनीतिक संबंध बताए गए। कुछ उम्मीदवारों को 718 और 719 जैसे गणितीय रूप से असंभव अंक मिले, जिन्हें एन॰टी॰ए॰ ने ‘ग्रेस माक्र्स’ कहकर उचित ठहराने की बेकार सी कोशिश की। यू॰जी॰सी॰-NET परीक्षा को गृह मंत्रालय से डार्कवेब पर पेपर लीक की सूचना मिलने के बाद रद्द कर दिया गया। इसी दौरान कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (सी॰यू॰ ई॰टी॰) भी कंप्यूटर क्रैश, देरी से शुरुआत और अचानक परीक्षा केंद्र बदलने जैसी समस्याओं से लगातार प्रभावित रहा, जिससे इसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हुए।

निर्णायक मोड़ः नीट 2026 संकट और पुनर्परीक्षा पर भी खतरा

संकट अपने चरम पर 2026 में पहुँचा। जाँचकर्ताओं ने पाया कि कोचिंग सेंटर संचालकों द्वारा लाखों रुपये में बेचे जा रहे ‘गेस पेपर’ वास्तविक नीट-यूजी 2026 प्रश्नपत्र से लगभग पूरी तरह मेल खाते थे। 2024 के विवाद के विपरीत, इस बार लीक का पैमाना इतना सुस्पष्ट था कि उसे नजरअंदाज करना या कम करके दिखाना संभव नहीं था। सरकार को पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी और 21 जून 2026 को राष्ट्रव्यापी पुनर्परीक्षा आयोजित करने का आदेश देना पड़ा, जिसके बाद ब्ठप् की जाँच और कई राज्यों में गिरफ्तारियाँ हुईं।

जैसा कि अब एक परिचित पैटर्न बन चुका है, कार्रवाई का निशाना केवल श्रंखला के निचले स्तर के लोग बने, जबकि ऊपर बैठे सूत्रधार अछूते रहे। 2026 की घटना ने राष्ट्रीय बहस को ही बदल दिया। अब प्रश्न यह नहीं रह गया था कि पेपर लीक हुआ था या नहीं, बल्कि यह कि क्या भारत की केंद्रीकृत परीक्षा प्रणाली संरचनात्मक रूप से इतनी सक्षम है कि वह किसी भी स्तर की विश्वसनीयता के साथ उच्च परीक्षाएँ आयोजित कर सके। स्थिति को और गंभीर इस बात ने बना दिया कि पुनर्परीक्षा से पहले ही आरोप सामने आने लगे कि जून 2026 का प्रश्नपत्र टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्मों पर बिक्री के लिए उपलब्ध है।

सी॰बी॰एस॰ई॰ 2026 ओ॰एस॰एम॰ संकट और पुनर्मूल्यांकन व्यवस्था का पतन

इसी दौरान बोर्ड परीक्षाओं की मूल्यांकन प्रक्रिया भी पूरी तरह चरमरा गई। 2026 में सी॰बी॰एस॰ई॰ ने कक्षा 12 की परीक्षाओं के लिए डिजिटल ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओ॰एस॰एम॰) प्रणाली लागू की। जनवरी में आयोजित ड्राई रन के दौरान मूल्यांकनकर्ताओं ने सी॰बी॰एस॰ई॰ को 36 गंभीर तकनीकी खामियों के बारे में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी- जिनमें अंकों का स्वतः बढ़ना-घटना, ‘“अन डू”’ का प्रयोग करने पर सिस्टम का फ्रीज हो जाना जिससे गलत मूल्यांकन हो जाता था शामिल थे। इसके बावजूद सी॰बी॰एस॰ ई॰ ने इस प्रणाली को लागू कर दिया।

परिणामस्वरूप एक विनाशकारी मूल्यांकन संकट पैदा हुआ। स्कैन की गई उत्तर पुस्तिकाओं के पन्ने गायब थे, कई स्कैन धुंधले थे और अनेक मामलों में कुल अंक गलत जोड़े गए थे। इस अव्यवस्था के कारण 56,000 से अधिक छात्रों को पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करना पड़ा। अंततः सी॰बी॰एस॰ई॰ के अध्यक्ष राहुल सिंह और सचिव हिमांशु गुप्ता को पद से हटाना पड़ा।

इस चोट को और गहरा करते हुए, पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया भी गंभीर तकनीकी समस्याओं का शिकार हो गई। अपने अंक सुधारने की कोशिश कर रहे छात्रों को ‘पेमेंट पोर्टल क्रैश’ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिससे आवश्यक वेबसाइटें तक नहीं खुल पा रही थीं।

इस पूरे प्रकरण को और चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि सी॰बी॰एस॰ई॰ ने अपना डिजिटल मूल्यांकन अनुबंध Coempt नामक कंपनी को दिया था, जिसका पूर्व नाम Globarena Technologies था और जो तेलंगाना में पहले भी बड़े परीक्षा विवादों से जुड़ी रही है। यह कंपनी नागपुर विश्वविद्यालय में भी चल रहे विवादों में घिरी हुई है। ऐसे रिकॉर्ड के बावजूद उसे यह अनुबंध दिया जाना इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था में ईमानदारी और पारदर्शिता के प्रति उदासीनता कितनी गहरी हो चुकी है। परीक्षा धोखाधड़ी भारत में नई बात नहीं है, लेकिन वर्तमान आर॰एस॰एस॰-भाजपा शासन के दौरान इसका पैमाना और बेशर्मी अभूतपूर्व स्तर तक पहुँच चुकी है।

विशेषज्ञता नहीं, नौकरशाहीः नेतृत्व की विफलता

इन बार-बार होने वाली विफलताओं का प्रमुख कारण यह है कि भारत की परीक्षा संस्थाओं का नेतृत्व कैसे किया जाता है। बार-बार देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा एजेंसियों की कमान ऐसे IAS अधिकारियों को सौंपी जाती है, जिनके पास शैक्षिक मूल्यांकन, परीक्षा सुरक्षा या साइकोमेट्रिक्स का कोई विशेष अनुभव नहीं होता।

2024 के नीट संकट के दौरान एन॰टी॰ए॰ का नेतृत्व करने वाले सुबोध कुमार सिंह, 2026 की परीक्षा रद्दीकरण के समय एन॰टी॰ए॰ के प्रमुख रहे अभिषेक सिंह, तथा सी॰बी॰एस॰ई॰ के क्रमिक अध्यक्ष, सभी एक ही प्रकार की नौकरशाही पृष्ठभूमि से आते हैं। आलोचक एन॰टी॰ए॰ के अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार जोशी के आर॰एस॰एस॰ से जुड़े संबंधों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि व्यापम घोटाले के दौरान वे मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) के अध्यक्ष थे। इस संयोग के कारण कई लोग उन्हें व्यंग्य में ‘घोटालों का विशेषज्ञ‘् कहने लगे हैं।

जून 2024 में एन॰टी॰ए॰ के महानिदेशक पद से हटाए जाने के बाद सुबोध कुमार सिंह का करियर भी बहुत कुछ बताता है। किसी वास्तविक दंड का सामना करने के बजाय उन्हें पहले इस्पात मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और वित्तीय सलाहकार बनाया गया। बाद में उन्हें छत्तीसगढ़ वापस भेजा गया, जहाँ वे मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव जैसे अत्यंत वरिष्ठ पद पर पहुँच गए।

यह एक परिचित कार्यप्रणाली को उजागर करता हैः जब कोई घोटाला इतना बड़ा हो जाता है कि उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता, तो दिखावे के लिए कुछ गिरफ्तारियाँ कर दी जाती हैं। इससे जवाबदेही का भ्रम तो पैदा होता है, लेकिन वास्तविक जवाबदेही नहीं होती। शीर्ष स्तर पर बैठे लोगों के लिए नीति कुछ और ही होती है - दंड नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण पुनर्वास।

कोचिंग माफिया और छात्रों को बाहर करना

एन॰ई॰पी॰ 2020 द्वारा नीट और सी॰यू॰ई॰टी॰ जैसी केंद्रीकृत प्रवेश एवं पात्रता परीक्षाओं को बढ़ावा देने का सबसे विनाशकारी परिणाम शिक्षा का तीव्र व्यावसायीकरण और ‘कोचिंग माफिया’ का विस्फोटक विस्तार रहा है।

चूँकि ये केंद्रीकृत परीक्षाएँ स्पष्ट रूप से सी॰बी॰एस॰ई॰ पाठ्यक्रम पर आधारित हैं, इसलिए राज्य बोर्डों के छात्रों को शुरू से ही गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप छात्रों को महँगी निजी कोचिंग संस्थाओं पर निर्भर होना पड़ता है, जो अनौपचारिक रूप से विद्यालयों का स्थान ले चुकी हैं और कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं के महत्व को लगभग समाप्त कर रही हैं। आज स्थिति यह है कि किसी सामान्य स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश पाने के लिए भी छात्रों को सी॰यू॰ई॰टी॰ देना पड़ता है और उसके लिए महँगी कोचिंग का सहारा लेना पड़ता है।

यह व्यवस्था आम और वंचित तबकों के छात्रों को नियमित उच्च शिक्षा प्रणाली से बाहर धकेल रही है। सी॰यू॰ई॰टी॰ लागू होने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में राज्य बोर्डों से आने वाले छात्रों की संख्या घटकर मात्र 2 प्रतिशत रह गई, जबकि पहले यह औसतन लगभग 40 प्रतिशत हुआ करती थी। कोचिंग संस्थानों की बाढ़ का अर्थ यह है कि केवल वही छात्र इस केंद्रीकृत व्यवस्था में सफल हो सकते हैं जो भारी-भरकम फीस देने में सक्षम हैं। इस प्रकार शिक्षा व्यवस्था में एक विशाल सामाजिक-आर्थिक विभाजन को संस्थागत रूप दिया जा रहा है।

विविधता का विनाश और मानवीय त्रासदी

यह केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था भारत के संघीय ढाँचे का उल्लंघन करती है तथा यह राज्यों की भाषाई और शैक्षिक विविधता की अनदेखी करती है। यह मिथक कि सी॰बी॰एस॰ई॰ के छात्र स्वाभाविक रूप से बेहतर होते हैं, भारतीय विज्ञान संस्थान (आई॰आई॰एस॰सी॰) के शोध द्वारा खंडित किया जा चुका है। इस शोध में पाया गया कि पश्चिम बंगाल बोर्ड के छात्र विज्ञान विषयों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, जबकि आंध्र प्रदेश के छात्र गणित और भौतिकी में उत्कृष्ट हैं। फिर भी, क्योंकि नीट सभी छात्रों को दिल्ली-केंद्रित पाठ्यक्रम अपनाने के लिए बाध्य करता है, राज्य बोर्डों के ये प्रतिभाशाली छात्र शीर्ष रैंक प्राप्त करने में विफल रहते हैं।

इस विफलता की पूरी श्रंखला के अंत में भारत के युवा खड़े हैं - वे युवा जिन्हें इस टूटी हुई व्यवस्था का पूरा बोझ उठाना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के स्वतंत्रता दिवस भाषण और युवाओं से किए गए बड़े-बड़े वायदों की पृष्ठभूमि में आज जो वास्तविकता उभरकर सामने आई है, वह एक गहरा विश्वासघात है। बार-बार होने वाले पेपर लीक, सरकारी विद्यालयों का लगातार कमजोर होना, शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ, बढ़ती असमानता और सिकुड़ता हुआ रोजगार बाजार - यही आज के युवाओं की वास्तविकता है।

जब परीक्षाएँ अचानक रद्द कर दी जाती हैं, तो यह छात्रों के लिए गहरे मानसिक तनाव और उन परिवारों के लिए भारी आर्थिक बोझ का कारण बनती है जिन्होंने दूर-दराज के शहरों में कोचिंग का खर्च उठाने के लिए अपनी सामथ्र्य से कहीं अधिक कर्ज लिया होता है।

इस टूटी हुई व्यवस्था की मानवीय कीमत को तमिलनाडु की अनिता की कहानी से बेहतर शायद ही कोई उदाहरण दर्शा सके। राज्य बोर्ड की कक्षा 12 परीक्षा में 98 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली यह प्रतिभाशाली छात्रा अपनी क्षमता के कारण नहीं, बल्कि संसाधनों की कमी के कारण हार गई। वह महँगी निजी कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकी, जिसकी नीट जैसी परीक्षा में सफलता के लिए लगभग अनिवार्यता बन चुकी है। जब सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी अपील खारिज कर दी तो उसने आत्महत्या कर ली। उनकी मौत कोई अकेली दुखद घटना नहीं थी - यह एक ऐसे केंद्रीकृत प्रणाली और कोचिंग पर निर्भर सिस्टम पर जबरदस्त आरोप था, जो चुपचाप सबसे कमजोर लोगों के लिए अपने दरवाजे बंद कर देता है।

जवाबदेही का अभाव

पूरी प्रक्रिया से स्पष्ट है, लगभग हर स्तर पर जवाबदेही का अभाव है। धर्मेंद्र प्रधान 2024 के संकट और वर्तमान संकट -दोनों के दौरान शिक्षा मंत्री रहे हैं, फिर भी उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी तक स्वीकार कर इस्तीफा नहीं दिया है। दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिकारी वही परिचित रास्ता अपनाते हैंः जब जनाक्रोश चरम पर होता है तो थोड़े समय के लिए स्थानांतरण या पद से हटाया जाना, और जैसे ही जनता का ध्यान दूसरी ओर चला जाता है, आरामदायक वापसी।

इसी प्रकार प्रधानमंत्री की यह घोषणा NEET उनकी प्रत्यक्ष निगरानी में होगा, यदि उसके प्रचारात्मक आवरण को हटाकर देखा जाए, तो वास्तव में यह स्वीकारोक्ति है कि एन॰टी॰ए॰ और शिक्षा मंत्रालय दोनों बुनियादी रूप से विफल हो चुके हैं। फिर भी किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया, किसी पर कार्यवाही नहीं हुई। यह घोषणा नीति नहीं, प्रदर्शन है।

इसी तरह यह दावा भी खोखला है कि अब प्रश्नपत्रों को लड़ाकू विमानों से पहुँचाया जाएगा। इस बात को छोड़ भी दें कि लड़ाकू विमान से प्रश्नपत्र व्यक्तिगत परीक्षा केंद्रों तक कैसे पहुँचेंगे, यह घोषणा स्वयं इस समस्या की प्रकृति को समझने में विफलता को दर्शाती है। उपलब्ध साक्ष्य लगातार यह दिखाते हैं कि लीक परिवहन के दौरान नहीं, बल्कि उससे बहुत पहले - प्रश्नपत्र तैयार करने वालों, अनुवादकों या डिजिटल स्रोतों पर सेंधमारी के स्तर पर होता है।

संक्षेप में, व्यापम के राज्य-स्तरीय सॉल्वर गिरोहों से लेकर नीट 2026 के तकनीकी रूप से उन्नत नेटवर्क तक की कहानी एक ही निरंतर कथा को प्रस्तुत करती हैः भारत की परीक्षा व्यवस्था गहरे और व्यवस्थित रूप से भ्रष्ट तथा अक्षम हो चुकी है। उपलब्ध साक्ष्य अब आधे-अधूरे उपायों का समर्थन नहीं करते।

देश के युवाओं के हित में एन॰ई॰पी॰ 2020 की केंद्रीकरण की प्रवृत्तियों को वापस लेना होगा, एन॰टी॰ए॰ को समाप्त करना होगा और परीक्षाएँ आयोजित करने का संवैधानिक अधिकार राज्यों को लौटाना होगा। इससे संघीय संतुलन बहाल होगा और भारत की वास्तविक विविधता को उसकी शिक्षा व्यवस्था में अभिव्यक्ति मिल सकेगी। केंद्रीकरण ने केवल राज्यों के अधिकारों को कमजोर नहीं किया है, बल्कि भ्रष्टाचार को भी एक केंद्रीकृत ढाँचे में समेट दिया है, जिसे शक्तिशाली हित समूहों ने अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना सीख लिया है।

 

 

 

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