Monday, 28 January 2019

आप सरकार के शिक्षा सुधार के दावेः एक संक्षिप्त पड़ताल


जब से आप सरकार ने सत्ता संभाली है, कुछ क्षेत्रों को लेकर लगातार प्रचार कर रही है कि उसने इनमें बहुत सुधार किये हैं, शिक्षा उनमें से एक है। दिल्ली के स्कूलों में सुधार का प्रचार लगातार प्रिंट मीडिया व बड़े बड़े होर्डिंगों द्वारा ऐसे किया जा रहा है कि मानों सरकारी स्कूल अब एक आदर्श स्कूल बन गयें हैं। अनेक प्रगतिशील व जनपक्षीय लोग भी इसके कसीदे पढ़ रहे हैं। आइए जरा इसकी पड़ताल करते हैं। पीडीएसयू॰ ने सागरपुर के दो स्कूलों में शिक्षा व छात्रों की दशा का विस्तृत अध्ययन किया। उसकी रिपोर्ट दिल्ली शिक्षा निदेशायल की वेबसाइट के आंकड़े इस पड़ताल का आधार है।
स्कूल शिक्षा में किये गये प्रमुख बदलावों में एक है, छात्रों को विभिन्न समूहों में बांटना। कक्षा 6 से लेकर 8 तक के सभी बच्चों को सरकार ने आते ही तीन समूहों में बांट दिया- विश्वास, निष्ठा व प्रतिभा। कम अंक वाले बच्चे विश्वास, उनसे बेहतर बच्चे निष्ठा व उपरी कुछ बच्चे प्रतिभा में बांटे गये। इनके अलग सेक्शन भी कर दिये गये व अलग अध्यापक भी। कारण बताया गया कि इसे निष्ठा व विश्वास समूह में विशेष ध्यान दे कर उन्हें सुधारा जाएगा। हांलाकि बाद में विश्वास को निओ निष्ठा कहा गया और उसके पश्चात इन दोनों का भी विलय कर दिया गया।
इससे में कई समस्यायें खड़ी हुई हैं। एक, तो ये पहले से होते भेदभाव को और बढ़ाता है। वैसे ही सरकारी स्कूलों में केवल वो ही बच्चे आ पाते हैं जिनके माँ-बाप महंगे प्राइवेट स्कूलों का खर्च वहन नहीं कर सकते। अर्थात पहले से ही योग्यता के आधार पर नहीं पर आर्थिक क्षमता के आधार पर भेदभाव है और आर्थिक रूप से अक्षम बच्चे सरकारी स्कूलों ही पढ़ते हैं और ऐसे बच्चे बहुतायत हैं। अब यहां पर भी बच्चों को अलग अलग समूहों में बांट कर इसे और बढ़ा दिया गया है। ये बाल मनोविज्ञान को नजरांदाज कर ये वर्गीकरण किया गया है। इस के लिये बच्चों का हिंदी व अंग्रेजी लेखन व पठन क्षमता की परीक्षा ली जाती है। हर वर्ष अलग स्तर पर( 6 में अलग, 7 में अलग व 8 में अलग)। उस आधार पर से सेक्शन तय होते हैं। जो बच्चे पिछड़े हैं उनमें और हीन भावना पैदा की जा रही है। एक ही स्कूल में, एक ही जगह के बच्चे में से कुछ अपने को बेहतर समझते हैं व कुछ हीन। कमजोर बच्चे सदा के लिये कमजोर ही रह जातें हैं। वे एक दूसरे से आंख मिला कर बात नहीं कर पाते क्योकिं उन पर ठप्पा लग गया है।
दूसरे इसके घोषित उद्देश्य भी कहीं पूरे होते नजर नहीं आते। नीचे की तालिका देंखे। इसे स्पष्ट है कि इस वर्गीकरण से कोई लाभ नजर नहीं आता। अनुमानतः कक्षा 6 के बाद प्रतिभा के छात्रों की संख्या बढ़नी चाहिये थी, पर ऐसा नहीं हो रहा है बल्कि ये संख्या या तो लगभग स्थिर है या निष्ठा में बढ़ोतरी हुई है। झुग्गी बस्ती व मजदूर बस्तियों के निकटवर्ती स्कूलों की स्थिति तो और भी भयावह है। यहां पर कई जगह प्रतिभा सेक्शन ही नहीं बन पाया है य बहुत ही छोटा है। इस योजना तीन वर्ष पूरे होने के बाद भी।

स्कूल 1
स्कूल 2
कक्षा
प्रतिभा
निष्ठा
प्रतिभा
निष्ठा
6
166
157
82
167
7
150
149
52
184
8
83
172
53
183





केवल सेक्शन ही अलग नहीं है बल्कि पाठ्यक्रम व परीक्षा भी अलग है। निष्ठा के छात्रों के लिये पाठ्य पुस्तकों में से अनेक पाठ हटा दिये गये हैं। अतः इन्हे पढ़ाया भी कम जाता है। इनके लिये अलग पुस्तक भी प्रयोग में लाई जाती हैं। जिन्हे ‘प्रगति’ पुस्तक का नाम दिया गया है। ये मूलतः क्रियाकलाप पुस्तक (वर्कबुक या एक्टिविटी बुक) हैं। अर्थात न केवल कम पाठ्यक्रम बल्कि पुस्तकें भी बेहद हल्की। यह भी दीगर है कि ये पुस्तकें एक एन॰जी॰ओ॰ ने सर्वप्रथम प्रकाशित की थीं अब उसी एन॰जी॰ओ॰ की पुस्तकें पूरे दिल्ली के स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं अतः उस एन॰जी॰ओ॰ व प्रकाशक का लाभ तो देखा ही जा सकता है। इनकी परीक्षा भी इसी कमतर पाठ्यक्रम में से होती है। अतः स्पष्ट है कि बच्चे पास तो हो ही जायेंगे पर प्रतिभा व निष्ठा की शैक्षणिक योग्यता भिन्न होगी। जब 8वीं के बाद वे एक समान परीक्षा में बैठेंगे, तो जाहिर है वे पीछे रह जायेंगे। साथ ही जो पाठ वे नहीं पढ़े हैं उन में उनका आधार ही नहीं बना होगा तो स्पष्टतः वे आगे के पाठ्यक्रम को नहीं समझ पाएंगे क्योंकि आगे के पाठ्यक्रम तो यह मान कर तैयार किया जाता है कि पूछे के सभी पाठ बच्चों ने समझ लिये हैं। इस कारण ये सदैव पिछड़े ही रह जांएगे। ये छात्र हीन भावना से ग्रस्त व आत्मविश्वास में कम रहेंगे।
दूसरा बदलाव किया गया है कि 9वीं के बाद एक उच्च्तम आयू सीमा बना दी गई है। साथ ही जो बच्चे कक्षा 9 में फेल हो गये थे उन्हें जबरन ही नियमित स्कूल से हटा कर ‘पत्राचार’ में डाला गया है। इन छात्रों य इनके मां बाप को ठीक से बताया भी नहीं जाता और इन्हे कहा जाता है कि एक नया फॉर्म भरना है और छात्रों को स्कूल में कक्षा 9 में बैठने दिया जाता है, पर पत्राचार में उन्हें कक्षा 10 की परीक्षा दिलाई जाती है। जाहिर है कि जो बच्चे नियमित स्कूल के बाद कक्षा 9 में पास नहीं हो पाये, जब उन्हें पुनः 9 में बैठा कर सीधे 10वीं की परीक्षा दिलाई जाती है तो परिणाम भयावह ही होंगे। 2017 में कुल परिणाम 4 प्रतिशत रहा, और अनेक स्कूलों में तो शत प्रतिशत छात्र फेल हो गये। अब ये बच्चे नियमित स्कूल के छात्र नहीं रहे। इन्हे पुनः दाखिले के लिये पत्राचार से टी॰सी॰ लेना होगा व स्कूल में पुनः आवेदन करना होगा। इन्हे कक्षा 10 में प्रवेश नहीं मिल सकता, व 9 के लिये अधिकांश आयु अधिक हो गई। इस प्रकार ये बच्चे नियमित स्कूल व्यवस्था के बाहर हो गये। ये भी समझने योग्य बात है कि अनेक मजदूर वर्ग ने छात्र बार बार अपने पैतृक गांव जाने के कारण आयू के हिसाब से सही कक्षा में नहीं बैठ पाते। इसलिये ये अधिकतम आयु से जल्द ही बाहर हो जातें हैं। 10वीं का परिणाम प्रत्यक्ष ही बेहतर होगा क्योंकि सरकार ने 9वीं में ही छटांइ कर दी। इसी परिणाम पर शिक्षा मंत्री, सरकार अपनी ही पीठ बारम्बार ठोकते रहते हैं।
अब 10विं के परिणाम पर थोड़ा और नजर डालते हैं। तालिका से स्पष्ट है कि 2013 से लेकर 10वीं के छात्रों की संख्य में लगातार गिरावट आई है। जो उपर दिये गये विश्लेषण की पुष्टि करता है। और 2018 में परिणम में भी केवल 68.90 प्रतिशत। और यदि कुल छात्रों की संख्या देखी जाये तो और भी कम। 2013 में पास हुए छात्रों का केवल 47.83 प्रतिशर यानि आधे से भी कम। 2017 में भी यह केवल 72 प्रतिशत ही था। क्योंकि छात्रों की पहले छंटनी कर दी गई है तो प्रतुशत अलग दिखता है। ये शिक्षा मंत्री के फिनलैण्ड दौरे व उसके बाद चुने हुए शिक्षकों को फिनलैण्ड में प्रशिक्षण के बाद। शिक्षा बजट कहां खर्च हो रहा है इसका भी संकेत मिल रहा है।
वर्ष
कुल छात्र
पास प्रतिशत
पास छात्र
2013
197934
99.46
196858
2014
180203
98.81
178067
2015
140086
95.81
134223
2016
140638
89.25
125526
2017
155263
92.44
143525
2018
136663
68.90
94160

इसी प्रकार 12वी का परिणाम भी रोचक तथ्य उजागर करता है। 12वीं का परिणाम लगातार 10वीं से खराब है। जबकि यदि 2 वर्ष पूर्व के दसवीं में बैठे बच्चों से तुलना करे तो 2015 से संख्या भी लगातार कम हो रही है, जो कि इस व्यवस्था के प्रभाव के वर्ष हैं।
वर्ष
कुल छात्र
पास प्रतिशत
दो वर्ष पूर्व 10वीं में छात्र
अंतर कुल व प्रतिशत
2013
139003
88.65


2014
166257
88.67


2015
140191
88.11


2016
131354
88.91


2017
121681
88.27
140086
18405 (13.13)
2018
112826
90.64
140638
27812 (19.77)

दिल्ली सरकार ने केवल एक प्रकट काम किया है वह है नई इमारतों का निर्माण। हांलकि अनेक जगह अनावश्यक रूप से कमरे बनाये गये हैं वहीं कहीं पुरानी जर्जर व कम क्षमता वाली इमारतों को बदल कर नई इमारतों का निर्माण किया है। पर जाहिर है इमारतें छात्रों को नहीं पढ़ा सकतीं। इमारतें बनने के बाद भी अनेक बुनियादी सिविधायें नहीं हैं। छात्रों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले शैचालय में स्वच्छता का कोई दुरुस्त प्रबंध नहीं है। एक कमरे में क्षमता से अधिक बच्चे डाले जाते हैं। दो छात्रों की डेस्क पर तीन से चार छात्र बैठा दिये जातें हैं। वो लिख भी नहीं पाते। नई इमारतें की जगह चूने लगीं हैं। एक स्कूल में एक छत चूती थी, जिसकी मरम्मत की बात की गई तो पूरे स्कूल की छतों कॉ बदलने का टेण्डर पास करा दिया गया और सभी छतों का पुनर्निर्माण कर दिया गया। नतीजन अब चार छतें चूती हैं। निर्माण व मरम्मत कार्य में सरकारी अमलों में व्याप्त भ्रष्टाचार से सभी वाकिफ हैं।
 छात्र शिक्षक अनुपात में कोई बदलाव नहीं है। जैसा कि ऊपर डेस्क के संदर्भ में लिखा गया है, वही बात इस अनुपात पर भी लागू होती है। आदर्श रूप से एक शिक्षक के पास 20 से 35 छात्र होने चाहिये, पर अमूमन 60 से 100 छात्र होतें हैं, और इस दिशा में प्रयास के कोई आसार नहीं दिखते। इतने छात्रों को कैसे पढ़ाया जाएगा, कैसे वे शिक्षक की बात सुनेंगे इस ओर कोई सोच सरकार की नजर नहीं आती। कई विषयों के शिक्षक हैं ही नहीं, कुछ जगह एक ही शिक्षक को उनका विषय दो विद्यालयों में पढ़ाने की जिम्मेदारी दे दी जाती है। इसके असर की व्याख्याअ की आवश्यकता नहीं है।
सभी स्कूलों में 8वीं कक्षा तक मिड डे मील दिया जाता है। इसके ठेके अनेक एन॰जी॰ओ॰ को दिये गये हैं। इसकी गुणवत्ता पर कई बात प्रश्नचिन्ह लग चुका है। अनेक बार बच्चे बीमार भी हुए हैं। पर इसमें कोई सुधार नहीं हुआ। इसका असली समाधान स्कूल के निकटवर्ती इलाकों की महिलायों खाना पकाने का काम दिया जाए व प्राध्यापक सहित सभी शिक्षक छात्रों के साथ भोजन करें तो ही हो सकता है। से स्थानीय महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा व सुधार भी होगा।
शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत एक स्कूल मैनेजमेण्ट कमेटी (एस॰एम॰सी॰) बनाना जरूरी है, जिसमें स्थानीय विधायक भी होगा व स्थानीय लोग चुने जायेंगे। पर इसमें विधायक के स्थानीय आदमी होते हैं जो इलाके के दबंग हैं। वे बिना स्कूल व शिक्षा की समस्याओं को जाने समझे शिक्षकों व छात्रों पर दादागिरि करते हैं।
उपरोक्त रिपोर्ट से हम देख सकते हैं कि पूरे स्कूल व्यवस्था एक प्रकार से तबाह ही कर दिया गया है| दिल्ली के आम बच्चे, जो मजदूर वर्ग, निम्न वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं, उनके लिये शिक्षा और बेकार हो गई है। पहले से ही अच्छी शिक्षा पर उच्च वर्ग का आधिपत्य था जो अपने बच्चों को मंहगे प्राइवेट स्कूलों में भेज सकते हैं, और बाकी बच्चों के लिये सरकारी स्कूल थे, जहां योग्य शिक्षक होने के बावजूद भी सुविधायों व उचित माहौल के अभाव में शिक्षा का स्तर ठीक नहीं होगा था व यहां से पढ़ कर निकले बच्चे प्राइवेट स्कूल से निकले बच्चों के समक्ष पीछे रह जाते थे। पर अब सरकारी स्कूल के भीतर ही भेदभाव को बढ़ावा दिया जा रहा है। जो बच्चे निष्ठा में हैं उन्हें कमतर पढ़ाया जाता है और हल्की परीक्षा ली जाती है। उनका आधार ही कमजोर बना दिया जाता है। अर्थात, अब वे बच्चे निष्ठा में ही रहने को या दूसरे शब्दों में पिछड़े ही रहने को अभिशप्त हैं। आगे जब वे उच्च कक्षाओं में जायेंगे तो जाहिर है कि वे प्रतिभा वाले बच्चों के साथ मुकाबला नहीं कर पायेंगे और आगे बढ़ ही नहीं पायेंगे। 9वीं के बाद और फिर 10वीं में जब बोर्ड की परीक्षा होगी, तब इनके प्रदशन का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार एक ही जगह के बच्चों में अच्छे व खराब में बटवारां कर दिया गया है, और केवल कुछ का ही आगे जाने का रास्ता प्रशस्त किया जा रहा है।
इसी कड़ी में दिल्ली में 5 ‘स्कूल्स ऑफ एक्सीलेंस’ बनाये गये हैं जिनमें प्रति कक्षा में केवल दो सेक्शन होंगे। आम तौर पर 8 से 10 सेक्शन तक होते हैं। कक्षा एक से आठ तक 25 बच्चे व 9 व 11 में 40 बच्चे प्रति सेक्शन होंगे। इनका दाखिला प्रवेश परीक्षा से होगा व ‘नेबरहूड पोलिसी’ का पालन नहीं होगा। यानि इलाके के बाहर के लोग भी इसमें आ सकते हैं। ये बच्चों में एक नये प्रकार का भेद भाव पैदा करेगा। दिल्ली के गिने चुने बच्चे अच्छी शिक्षा के हकदार होगें। यानि कुछ ही बच्चों को आगे बढ़ने का मौका (दिल्ली में 9वीं के बाद केवल 400 बच्चे)। असमान शिक्षा नीति में एक स्तरीकरण और बढ़ाया जा रहा है वो भी सरकारी स्तर पर नीतिगत रूप से।
दूसरे बच्चों के एक बड़े भाग को स्कूल व्यवस्था से ही बाहर कर दिया गया है। जो बच्चे कक्षा 9 में एक बार फेल हो गये हैं (अनेक जगह जैसे मदनपुर खादर, सरिता विहार, जैतपुर आदि ये संख्या 2017 में बहुमत बच्चों की थी), वे ‘दिल्ली पत्राचार’ या एन॰आई॰ओ॰एस॰ में जाने को मजबूर हैं। बच्चों के भविष्य की कीमत पर आप सरकार के तथाकथित शिक्षा सुधार हो रहें हैं। ये कदम केवल बच्चों की कुर्बानी देकर कृत्रिम तरीके से परिणाम सुधार कर अपनी वाहवाही करने जैसा है।
वास्तविक शिक्षा सुधार जिसमें सभी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक हों ताकि शिक्षक छात्र अनुपात 1: 35 से अधिक नहीं होना चाहिये, सभी विषयों के शिक्षक सभी स्कूलों में उप्लब्ध हों, जैसी समस्याओं पर कुछ ध्यान ही नहीं है। न ही अन्य बुनियादी सुविधाओं पर जैसे कि डेस्क की कमी, स्वच्छ शौचालयों की कमी, टीचींग एड्स का अभाव, प्रयोगशालाओं का अभाव व उनमें पर्याप्त उपकरणों का न होना, सुसज्जित कंप्यूटर लैब का अभाव आदि। न ही नये प्रशिक्षित पर्मानेण्ट शिक्षकों की भर्ती पर ध्यान है। न ही इस ओर कोई चिंतन किया गया है कि सभी बच्चों के स्तर को कैसे सुधारा जाये या कुल शिक्षा स्तर को कैसे सुधारा जाये।
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि आप सरकार का यह प्रचार केवल अपनी पीठ ठोकने के बराबर है। केवल कुछ टीमटाम की गई है, कुछ सुंदर नई इमारतें बनी हैं, परिणाम सुधार दिखाने हेतु छात्रों की छंटनी कर बहुतों को तो स्कूल सिस्टम से ही बाहर कर दिया गया है। छात्रों में परस्पर भेदभाव बढ़ाया गया है और किसी भी बुनियादी प्रश्न को हल करने की न कोशिश की गई है और न ही भविष्य में उस और कुछ प्रयास नजर आतें हैं। जंग लगी इमारत पर नया पेंट कर उसे चमकाया गया है और जगह तो और जीर्ण करा जा रहा है जैसे कि भेद भाव बढ़ाना। इस समस्या का हल छात्रों व मां बाप, अभिवावकों के साथ लेकर एक आंदोलन से ही निकल सकता है।


Wednesday, 12 December 2018

5 राज्यो ने चुनावी नतीजों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी


पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने आरएसएस-बीजेपी के विशेष रूप से मोदी-शाह जोड़ी के अहंकार पर एक थप्पड़ जड़ा है। शायद उन्होंने इसे पहले समझ लिया था और अपने 2014 के चुनावी वायदों को पूरा न करने के बारे में अच्छी तरह से जानते थे। अब जबकि 2019 के आम चुनाव करीब आ रहे हैं, ये चुनाव बहुत महत्वपूर्ण थे। शायद दोनों को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने मुद्दे बदल् दिये । विकास के बजाय, 'हिंदुत्व' और गाली गलौज जैसी भाषा प्रचार में आगे रहे। नेहरू, जगहो के नाम बदलने, मंदिर आदि मुख्य मुद्दे बन गयेउनकी निराशाओं को इस तथ्य से देखा जा सकता है कि इन चुनावों से ठीक पहले, और बड़े खेल से छह महीने पहले, उन्होंने ऑगस्टा डील के दलाल को बुलाया, माल्या पर शिकंजासा, वाड्रा आदि पर छापे मारे। हमने देखा है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, कल्याण सिंह की अगुवाई वाली भाजपा सरकार का पूर्ण बहुमत था पर उसके बाद पूर्ण बहुमत के साथ वापस आने में लगभग 25 साल लग गए। भारत के लोगों द्वारा कट्टर और हिंसक सांप्रदायिकता को हमेशा खारिज कर दिया गया है। शायद, यही कारण है कि, योगी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया गया था क्योंकि हिंदुओं के समझदार हिस्सा उनके लिए वोट नहीं करता।
अगर आपको याद है कि जब दिल्ली और बिहार के नतीजे आए, तो भक्तों ने जनता को ही खारिज करना शुरू कर दिया था और ऐसी प्रतिक्रियाएं अब भी अपेक्षित ही होंगी। पुराना मजाक "जनता ने हममें विश्वास खो दिया है,  इसलिए चलो जनता को भंग कर दें और नए का चयन करें" उनसे बहुत उपयुक्त है। वे इतने अंधे हैं कि वे अपने भगवान और उसकी पार्टी में कोई गलती नहीं देख सकते हैं। मुझे याद है कि एक भक्त नोटबंदी का जिक्र कर रहा था और कहा कि उन दिनों में उसे नकद या बैंक कतारों में कोई समस्या नहीं हुई। वह सच्चा भक्त था क्योंकि अधिकांश नोटबंदी व भाजपा समर्थक इसे 'देश के हित' के लिए समर्थन दे रहे थे लेकिन हो रही असुविधा को स्वीकार किया गया था। ऐसे लोग की तरह अब भी अपनी ही दुनिया में रहेगें और कुछ आत्मनिरीक्षण करने के बजाय लोगों को दोष देंगे।
पर लोगों को बार-बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। और मीडिया के बावजूद, सभी सरकारी और सांविधिक निकायों के खुले आम दुरुपयोग के बावजूद, परिणाम भक्तों की पसंद कानहीं आया। बढ़ती बेरोजगारी, किसानों का संकट, जीएसटी, नोटबंदी, आवश्यक वस्तुओं  कीमतों में वृद्धि, निर्बाध बढ़ता भ्रष्टाचार,  बढ़ती विषमतायें, असंतुष्ट आदिवासियों, श्रमिकों, शिक्षा, मानव अधिकारों पर हमलों का परिणाम ऐसा ही आना था। देखिये आगे क्या होता है, क्योंकि छह महीने तो कुछ समय है और मुख्य मुद्दों से भटकाकर मंदिरों जैसे कृत्रिम मुद्दे  और सांप्रदायिक हिंसा कुछ फल दे सकते हैं।
हालांकि, गेंद एक कोर्ट में दूसरे कोर्ट पर गई है पर दोनों एक ही खेल के खिलाड़ी हैं। इसलिए कुछ भले की उम्मीद रखना खुद को बहलाना होगा। राजस्थान और मध्य प्रदेश के बारे में अच्छी बात यह है कि कांग्रेस केवल कगार पर है। ऐसी सरकारों पर हमेशा जनता का दबाव होता है और उनके लिए बेहतर होता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि  जबानी जमाखर्च के अलावा, कांग्रेस के पास आर्थिक मोर्चे पर कोई अलग नीति नहीं है। असल में, सांप्रदायिकता पर भी नहीं है। उसने खुद को खुले तौर पर  नरम हिंदुत्व पार्टी के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है (जो पहले गुप्त रूप से करती थी)। भारत के लोगों के लिए प्रसन्न होने के लिए बहुत कम मौका है, उन्हें सरकार के रंग बदलने बावजूद बुनियादी मुद्दों पर अपने संघर्ष जारी रखना होगा।
यह भी प्रतिबिंबित होता  है शासक वर्ग व  कॉर्पोरेट क्षेत्र के एक हिस्से ने फिर से कांग्रेस का समर्थन करना शुरू कर दिया है। राहुल गांधी के बेहतर दिखने वाले भाषण इसी तरह के संकेतक हैं। पप्पू और फेंकू दोनों की बौद्धिक क्षमता समान है, लेकिन मीडिया प्रचार के कारण, किसी के मूर्खतापूर्ण शब्दों को उजागर नहीं किया गया था। लेकिन कॉरपोरेट बैकिंग के साथ अब अलग बात है। असेंबली के परिणाम के बाद राहुल साक्षात्कार काफी परिपक्व था, और लगता है अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया गया है।
एक अच्छी बात है कि नोटा के प्रतिशत (छत्तीसगढ़ में 2%, एमपी में 1.4%, मिजोरम में 0.5%, राजस्थान में 1.3% और तेलंगाना में 1.1%) बढ़ रहा है। यह इन सभी शासक वर्ग पार्टियों से बढ़ते असंतोष को दिखाता है। इस असंतोष का जनता के जुझारू संघर्षों में तब्दील किया जाना चाहिए क्योंकि केवल लूटने वाले वाला चेहरा बदलना कोई समाधान नहीं है।

A Quick Short Reaction on Elections Results of Five States


The elections results of five states have slapped the arrogance of RSS-BJP specially Modi-Shah couple. They have sensed it earlier and knew it well about their non-deliverance of promises. With 2019 general election drawing close, these elections were very significant. Probably keeping both in mind, they have shifted gears. Instead of development, hard ‘Hindutva’ and semi abusive language became the fore of the propaganda. Nehru, name changing, temple became main issues. The desperations could be seen from the fact that just before these elections, and six months prior to big game, they called broker of Augusta Deal, tighten the noose on Malya, raids on Vadra etc. has taken place. We have seen that after demolition of Babri Masjid, there was a full majority of BJP government led by Kalyan Singh. It took nearly 25 years to come back with full majority. Hard and violent communalism have always been rejected by people of India. Probably, that is why, Yogi was not projected as CM candidate of UP as sensible section of Hindus would not have voted for him.
If you recall when Delhi, and Bihar results came, the bhakts have started dismissing people and such reactions will not be unexpected now.  old joke “people have lost faith in us, so let’s dissolve people and elect new one” is very apt from them. They are so blind that they cannot see any wrong in their god and its party. I remember a bhakt was recounting demonetization and observed that he has no problem with cash or bank queues in those days. He was true bhakt as most of the supporters were supporting it for ‘some greater cause’ but inconvenience was acknowledged. Like of such people will remain in fool’s paradise even now and will blame people rather than doing some introspection.
People cannot be fooled again and again. And despite media, despite blatant misusing of all government and statutory bodies, the result was not to the liking of bhakts. Growing unemployment, distress of farmers, GST, demonetisation, price rise if essential commodities, unstoppable rampant corruption, escalating disparity, disgruntled Adivasis, attacks on workers, education, human rights had had its toll. What happens next is to be seen, as six months is some bit of time and diverting attentions from main issues to artificial ones like temple, and communally violent deeds may give some fruits.
However, the ball has gone to one court to another and both are players of same game. So, expecting anything substantial will be living in fool’s paradise. Good thing about Rajasthan and MP is that Congress is on the brink. Such governments always have a pressure of people and are better for them.  It must be noted that apart from lip service, Congress has no different policies on economic front. In fact, even on communalism, it has tried itself to project as open soft Hindutva party (which it used to do covertly). So little to cheer for people of India, they have to continue their struggles on basic issues, irrespective of the colour and hues of the government.
This is also reflective of a section of ruing class and corporate sector has started backing Congress again. The better looking speeches of Rahul Gandhi are indicative of the same. intellectual content of both Pappu and Fenku is similar, but due to media hype, one’s idiotic utterances were not highlighted. But with corporate backing its different now. His interview after assembly results was a mature one, and has been tutored well.
One good feature is growing percentage of NOTA( 2% in Chhattisgarh, 1.4% in MP, 0.5% in Mizoram, 1.3% in Rajasthan & 1.1% in Telangana). It shows growing disconnect with all these ruing class parties. This discontent must be translated into militant struggle of people as merely changing the face of plunderer is no solution.

Friday, 9 March 2018

Lenin and Indian Freedom Struggle


Once a poet commented that a statue was silent but when you demolish it, thousands of mouths start speaking. That’s what has happened when statue  of Lenin was demolished in Tripura. It sparked of a debate, outcries and protest all over. The Sanghi Gang has come up with their set of arguments and most interesting of these being – Why make noise over a foreigner’s statue? What was contribution of Lenin to India etc. etc.
Well, while Lenin was foreigner but he was not merely a Russian phenomenon. He was icon as well as a guide to working class and deprived world over. He developed science of Marxism to a new level and was not confined to just Russia. He symbolizes the taking of power by working class for the first time in history of world and working towards building a just and egalitarian society. It is like saying Newton’s laws of motion or theory of gravitation is English phenomenon.
 But leaving all this for time being let us see the hollowness of their arguments about freedom struggle.
Khiar brothers requested Lenin on 23 November 1918 to help Freedom Struggle and Lenin enthusiastically obliged. Even before Russian revolution Lenin has supported Indian Freedom struggle and appreciate greatly the strike of workers against the arrest of Tilak. When Tilak was charged with sedition and sentenced to six years' imprisonment in Burma, Lenin described it as "infamous sentence pronounced by the British jackals on the Indian democrat Tilak." In hailing Tilak as a democrat and condemning his unjust treatment at the hands of the British, Lenin made invaluable contributions in recognising the leadership of India in the first decade of the 20th century for the cause of India's freedom. Tilak hailed Lenin in his paper Kesri.
In 1919, Mahendra Pratap and Baraktullah established “Indian Revolutionary Association” Lenin has helped them with training in warfare. Interested people can read anecdotes of Raja Mahendra Pratap.
On May 20th, 1920 Lenin addressed a meeting of above organization and asserted that unity of Hindus and Muslims will be a key factor in success of Indian freedom struggle and wished for the unity of working class.
It was Lenin who also inspired Bhagat Singh and his Colleagues. The incident of His reading Lenin’s book in last time is very well known.
It was Lenin who arranged for training of manufacturing bombs and weapons to Dr. Gaya Prasad Katiyar and associates who were members of HRSA.
Many more things can be added but we should ask a counter question. What is the contribution of RSS and its functionaries? Savarkar’s apology and succumbing to British is well known. so is the incident of Atal Bihari working as police agent.
Their main ideologue was dissuading Indian people from participating in freedom struggle (read his own writings), was helping British to sabotaging quit India movement.
Before taking the name of Indian Freedom Struggle they must look back their role in that. They have a history of betrayal of the country  and using methods of spreading lies and hatred.